Wednesday, February 4, 2026

Biharमें पलायन चुनावी मुद्दा क्यों नहीं बनता? बेरोजगारी और विजन की कमी पर उठते सवाल

by Sujal
bihar में हर साल लाखों लोग रोजगार की तलाश में पलायन करते हैं, फिर भी यह चुनावी मुद्दा नहीं बन पाता. जानिए क्यों मौन हैं राजनेता, और क्यों बिहार के विकास के वादे सिर्फ मंच तक सीमित रह जाते हैं.

Bihar में पलायन चुनावी मुद्दा क्यों नहीं बनता आखिर क्‍यों मौन हैं राजनेता?

पटना:
Bihar — एक ऐसा राज्य जो अपनी सांस्कृतिक विरासत, बुद्धिजीवी समाज और मेहनतकश लोगों के लिए जाना जाता है — आज भी पलायन की पीड़ा झेल रहा है. हर साल लाखों बिहारी रोजगार और बेहतर जीवन की तलाश में दिल्ली, मुंबई, गुजरात, पंजाब या फिर दक्षिण भारत का रुख करते हैं. लेकिन सवाल यह है कि जब यह इतनी बड़ी समस्या है, तो बिहार में होने वाले हर चुनाव में यह मुद्दा गायब क्यों रहता है?

Latest And Breaking News On Ndtv

पलायन की जड़ों में छिपा है बेरोजगारी और अवसरों की कमी का दर्द

बिहार में पलायन कोई नया विषय नहीं है. यह दशकों से चली आ रही एक जमीनी हकीकत है. लेकिन इसकी जड़ में बेरोजगारी, उद्योगों की कमी और सरकारी उदासीनता है.
राज्य के युवाओं के पास खेती के अलावा रोजगार के सीमित अवसर हैं. सरकारी नौकरियों की संख्या नगण्य है और निजी निवेश न के बराबर. यही वजह है कि 12वीं या ग्रेजुएशन पूरी करने के बाद युवा रोजगार की तलाश में शहरों की ओर निकल पड़ते हैं.

सरकारी आंकड़ों की बात करें तो बिहार की लगभग 70% आबादी आज भी कृषि पर निर्भर है, लेकिन खेती से होने वाली आय परिवार के भरण-पोषण के लिए पर्याप्त नहीं. यही वजह है कि लोग मजदूरी के लिए दूसरे राज्यों का रुख करते हैं.

Latest And Breaking News On Ndtv

चुनावों में पलायन क्यों नहीं बनता बड़ा मुद्दा?

हर पांच साल में जब चुनावी नगाड़े बजते हैं, तो नेताओं की ज़ुबान पर जाति, धर्म, आरक्षण, या फिर शराबबंदी जैसे मुद्दे छाए रहते हैं. लेकिन पलायन — जो राज्य के अस्तित्व से जुड़ा हुआ सवाल है — उस पर कोई चर्चा नहीं होती.

दरअसल, पलायन की चर्चा का मतलब है अपनी असफलता स्वीकार करना. अगर कोई नेता यह मान ले कि पलायन एक बड़ी समस्या है, तो जनता पूछेगी — “आखिर आपने इतने सालों में किया क्या?”
इसी डर से नेता चुप रहते हैं. वे जानते हैं कि पलायन का ज़िक्र करने का मतलब है अपने शासन की नाकामी को उजागर करना.

प्रशांत किशोर ने उठाई थी आवाज़, लेकिन जनता तक नहीं पहुंची

‘जन सुराज’ अभियान के तहत प्रशांत किशोर ने इस मुद्दे को कई बार उठाया. उन्होंने कहा था कि बिहार को तभी बदला जा सकता है, जब गांवों में रोजगार पैदा होगा और पलायन रुकेगा. लेकिन उनके अभियान में ठोस नीतियों का अभाव था. उन्होंने एक भावनात्मक अपील तो दी, मगर कोई ठोस रोडमैप नहीं.
इसी वजह से यह मुद्दा जनता की सोच में गहराई तक नहीं जा सका और राजनीतिक विमर्श का हिस्सा नहीं बन पाया.

छठ पूजा पर लौटते हैं लाखों बिहारी — भावनात्मक जुड़ाव का सबूत

छठ पर्व बिहार की आत्मा से जुड़ा त्योहार है. इस दौरान लाखों प्रवासी बिहारी अपने गांव लौटते हैं. पटना, मुजफ्फरपुर, दरभंगा जैसे स्टेशनों पर भीड़ का आलम बताता है कि पलायन कितना व्यापक है.
रेलवे के आंकड़ों के अनुसार, इस बार छठ के लिए सिर्फ मुजफ्फरपुर जाने के लिए लगभग 12.9 लाख टिकटें बिकीं, जबकि पटना का आंकड़ा 23 लाख से ऊपर है.
इनमें से आधे से ज्यादा लोग दिल्ली-बिहार रूट से यात्रा करते हैं.

यह दृश्य भावनात्मक तो है, लेकिन यह भी दिखाता है कि बिहार की आर्थिक स्थिति अब भी उन पर निर्भर है जो बाहर कमाकर घर भेजते हैं. यही लोग राज्य की अर्थव्यवस्था में अप्रत्यक्ष योगदान दे रहे हैं, जबकि सरकारें सिर्फ आंकड़ों में व्यस्त हैं.

गांवों से हो चुका है अस्तित्व का पलायन

बिहार के दूरस्थ गांवों में आज कई टोले लगभग खाली हो चुके हैं. युवा रोजी-रोटी की तलाश में बाहर हैं, और बुजुर्ग अपने बच्चों की प्रतीक्षा में गांव की गलियों में यादों के साथ रह गए हैं.

पटना, गया या मुजफ्फरपुर जैसे शहरों के पास के इलाकों में पलायन थोड़ा कम है, क्योंकि वहां कुछ स्थानीय रोजगार हैं. लेकिन मुख्यालय से दूर गांवों में स्थिति बेहद गंभीर है.
नीतीश कुमार ने खुद एक बार कहा था —

बिहार के शहरों में लोगों ने बड़े-बड़े मकान बनाए, पर नई पीढ़ी उन मकानों में रहना नहीं चाहती.

यानी, घर तो हैं, पर उनमें रहने वाले नहीं.

पलायन रोकने के लिए क्या किया जा सकता है?

यह सही है कि पलायन को पूरी तरह से रोकना संभव नहीं है. हर व्यक्ति को बेहतर जीवन की तलाश का अधिकार है. लेकिन अगर सरकार ठान ले, तो इसे काफी हद तक कम किया जा सकता है.
कुछ कदम जो इस दिशा में उठाए जा सकते हैं —

  1. हर गांव में लघु उद्योग:
    अगर हर गांव में एक छोटा उद्योग शुरू हो, तो युवाओं को बाहर जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी।
  2. कृषि आधारित स्टार्टअप्स को बढ़ावा:
    बिहार की ताकत खेती है. अगर आधुनिक तकनीक से खेती को जोड़ा जाए, तो यह रोजगार का बड़ा स्रोत बन सकती है।
  3. स्किल डेवलपमेंट सेंटर:
    युवाओं को स्थानीय स्तर पर ट्रेनिंग देकर आत्मनिर्भर बनाया जा सकता है।
  4. निवेश के लिए अनुकूल माहौल:
    बिहार में निवेशक आज भी असुरक्षित महसूस करते हैं. कानून व्यवस्था और इंफ्रास्ट्रक्चर में सुधार से निवेश आकर्षित किया जा सकता है।

मजबूरी में किया गया पलायन — एक जीवन की कीमत

गोपालगंज के संजीत जैसे लाखों बिहारी हैं, जो नोएडा, गुरुग्राम, सूरत या मुंबई में दिन-रात मेहनत कर रहे हैं. वे डबल ड्यूटी करते हैं, कुछ रुपये जोड़ते हैं, ताकि छठ और होली पर गांव लौट सकें.

उनके लिए ये त्यौहार सिर्फ पूजा नहीं, बल्कि अपनी जड़ों से जुड़ने का मौका होते हैं. मगर हर बार लौटने के बाद जब वे अपने गांव की टूटी सड़कों और बंद स्कूलों को देखते हैं, तो मन में एक टीस उठती है — “क्या हमारा राज्य कभी सुधरेगा?”

क्या बिहार को फिर से आत्मनिर्भर बनाया जा सकता है?

उत्तर है — हां, लेकिन राजनीतिक इच्छाशक्ति चाहिए.
अगर सरकार और समाज एकजुट होकर ठान लें कि बिहार को आत्मनिर्भर बनाना है, तो इसे संभव किया जा सकता है.
हर घर में सूक्ष्म उद्योग और हर गांव में लघु उद्योग की स्थापना बिहार को नई दिशा दे सकती है.

लेकिन वर्तमान स्थिति में सरकार के पास न तो विजन है और न ही दीर्घकालिक योजना. राजनेता बस चुनावी मंचों से घोषणाएं करते हैं, लेकिन धरातल पर बदलाव नहीं दिखता.

बिहार की असली ताकत — उसके लोग

बिहार के लोग मेहनती हैं, ईमानदार हैं और सीखने की ललक रखते हैं. यही वजह है कि वे जहां भी जाते हैं, वहां सफलता की मिसाल पेश करते हैं. लेकिन दुख की बात यह है कि अपनी मिट्टी उन्हें वो अवसर नहीं दे पा रही, जो वे देश के बाकी हिस्सों में पाते हैं.

बिहार को बदलने के लिए केवल सरकार नहीं, बल्कि समाज को भी जिम्मेदारी उठानी होगी. पलायन रोकना तभी संभव है जब लोग खुद यह ठान लें कि वे अपने गांव में रहकर कुछ करेंगे, अपने राज्य को आगे बढ़ाएंगे.

यह भी पढ़ें:
Bhartiya TV के साथ पढ़ें हिंदी न्यूज़: हिंदी समाचार, Today Hindi News, Latest Breaking News in Hindi – Bhartiyatv.com

Satish Shah मशहूर एक्टर सतीश शाह का 74 साल की उम्र में निधन अशोक पंडित बोले – इंडस्ट्री ने खो दिया एक रत्न

You may also like

Adblock Detected

Please support us by disabling your AdBlocker extension in your browsers for our website.