SIR 2.0: अब मतदाता सूची में नाम जोड़ने के लिए नहीं दिखाने होंगे कागज
नई दिल्ली:
चुनाव आयोग ने सोमवार को Systematic Voters’ List Revision (SIR) के दूसरे चरण की तारीखों की घोषणा कर दी। इस बार मतदाताओं को Enumeration Form भरते समय दस्तावेज़ दिखाने की जरूरत नहीं होगी। आयोग ने यह कदम बिहार के अनुभव से सीख लेते हुए उठाया है।

अब यदि फॉर्म भरने के एक महीने बाद भी मतदाता का नाम पुराने और नए रिकॉर्ड में नहीं मिलता है, तभी 12 अधिकृत दस्तावेजों में से एक देना होगा। इस बदलाव से करोड़ों मतदाताओं को बड़ी राहत मिलेगी।
60-70% मतदाताओं का डेटा पहले से मैप हुआ
चुनाव आयोग के मुताबिक, करीब 60 से 70 प्रतिशत लोगों का नाम पहले से ही पुरानी और नई मतदाता सूची से जोड़ दिया गया है। मतदाता स्वयं भी आयोग की वेबसाइट पर जाकर अपना नाम देख सकते हैं।
अब केवल उन्हीं लोगों को दस्तावेज़ देने होंगे जिनका नाम और उनके माता-पिता का नाम पुराने रिकॉर्ड से मेल नहीं खा रहा है। इस प्रक्रिया से फर्जीवाड़े और दोहरी एंट्री की संभावना कम हो जाएगी।
बिहार से क्या सीखा आयोग ने?
बिहार में पहले चरण के दौरान सामने आई समस्याओं से आयोग ने कई सुधार किए हैं।
अब आधार कार्ड को मान्य दस्तावेज़ों की सूची में जोड़ दिया गया है। साथ ही स्कैन करने की नई डिजिटल सुविधा भी दी गई है।
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने कहा कि लोग सिर्फ एक ही जगह से Enumeration Form भरें, क्योंकि दो जगह से आवेदन करने वालों पर कार्रवाई हो सकती है।
क्यों नहीं होगा असम में SIR 2.0
असम में नागरिकता अधिनियम (NRC) के विशेष प्रावधान लागू हैं, इसलिए वहां SIR की प्रक्रिया फिलहाल नहीं होगी। चुनाव आयोग ने कहा कि उच्चतम न्यायालय की निगरानी में नागरिकता जांच लगभग पूरी हो चुकी है, इसलिए असम के लिए अलग तारीख का ऐलान बाद में किया जाएगा।
SIR 2.0 में कब और कितने वोटर होंगे शामिल
SIR का दूसरा चरण 4 नवंबर से 4 दिसंबर तक चलेगा।
- 9 दिसंबर: मसौदा मतदाता सूची जारी होगी।
- 7 फरवरी: अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित की जाएगी।
इस बार कुल 51 करोड़ मतदाता इस प्रक्रिया में शामिल होंगे। आयोग का कहना है कि SIR 2.0 का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कोई भी योग्य नागरिक छूटे नहीं और कोई अयोग्य व्यक्ति सूची में शामिल न हो।
मुख्य चुनाव आयुक्त ने बंगाल को लेकर क्या कहा

पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस ने SIR को लेकर अपनी आपत्तियां जताई हैं। इस पर ज्ञानेश कुमार ने स्पष्ट किया कि राज्य सरकार और आयोग के बीच कोई टकराव नहीं है। उन्होंने कहा कि आयोग अपना संवैधानिक कर्तव्य निभा रहा है और राज्य सरकारों को इस प्रक्रिया में सहयोग देना आवश्यक है।
क्या है कट-ऑफ डेट और पिछली सूचियों का उपयोग
आयोग ने सभी राज्यों के मुख्य निर्वाचन अधिकारियों के साथ दो बैठकों के बाद SIR की रूपरेखा तय की है। पुराने SIR डेटा को नए मैपिंग के आधार के रूप में लिया गया है।
दिल्ली में आखिरी गहन पुनरीक्षण 2008 में हुआ था, जबकि उत्तराखंड में 2006 में। वहीं बिहार की 2003 की मतदाता सूची को इस बार के पुनरीक्षण के लिए “कट-ऑफ” आधार बनाया गया है।
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