Bihar elections में रिकॉर्डतोड़ मतदान: क्या SIR बना इस बार के चुनाव का छिपा फैक्टर?
Bihar elections विधानसभा चुनाव 2025 के पहले चरण में ऐतिहासिक मतदान देखने को मिला।
राज्य के 18 जिलों की 121 सीटों पर 64.69% से अधिक मतदान दर्ज किया गया, जो अब तक का सबसे ऊंचा आंकड़ा है।
लेकिन इस बार का सवाल यह नहीं कि मतदान ज्यादा क्यों हुआ, बल्कि यह है कि क्या यह बढ़ोतरी वास्तविक है या आंकड़ों का खेल?
कई राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि इस बार बिहार में लागू किए गए SIR (Special Intensive Revision) का भी बड़ा असर मतदान प्रतिशत पर पड़ा है।
क्या है SIR — स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन?
SIR यानी Special Intensive Revision चुनाव आयोग की एक विशेष प्रक्रिया है, जिसमें वोटर लिस्ट की गहन समीक्षा की जाती है।
इस प्रक्रिया के तहत फर्जी, दोहराए गए, मृत या स्थानांतरित मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से हटा दिए जाते हैं।
बिहार देश का पहला राज्य है, जहां SIR प्रक्रिया पूरी होने के बाद चुनाव हो रहे हैं।
इस प्रक्रिया में लाखों ऐसे नाम हटाए गए हैं, जो कागज पर तो वोटर थे, लेकिन हकीकत में अस्तित्व में नहीं थे।
65 लाख नाम हटाए गए — बदला मतदाता संतुलन
SIR प्रक्रिया के दौरान बिहार की मतदाता सूची से करीब 65 लाख मतदाताओं के नाम हटा दिए गए।
इनमें बड़ी संख्या में वे लोग थे जो या तो
- दूसरे राज्यों में पलायन कर गए,
- कई बार एक से अधिक जगह दर्ज थे,
- या फिर जिनकी मृत्यु हो चुकी थी।
यानी मतदाताओं की कुल संख्या कम हो गई, जिससे मतदान प्रतिशत प्राकृतिक रूप से बढ़ा हुआ दिखाई देने लगा।
राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं कि
अगर वोटरों की संख्या कम होगी और सक्रिय मतदाता बढ़ेंगे, तो प्रतिशत अपने आप ऊपर जाएगा।”
SIR के बाद बिहार में मतदान का नया पैटर्न
2020 के विधानसभा चुनाव में बिहार का औसत मतदान प्रतिशत 57.5% था।
इस बार पहले चरण में यह बढ़कर 64.69% हो गया।
चुनाव आयोग के अनुसार,
इस बार मतदाता सूची अधिक सटीक और पारदर्शी है। फर्जी नाम हटने से वास्तविक वोटरों का प्रतिशत बेहतर तरीके से सामने आया है।”
मतलब, अब वोट डालने वाले वही लोग हैं जो सच में मतदान के लिए मौजूद हैं — और यही वजह है कि प्रतिशत ऊंचा दिख रहा है।
किन जिलों में दिखा SIR का असर?

पहले चरण की 18 जिलों की सीटों में कई ऐसे क्षेत्र हैं जहां SIR के तहत नाम हटाने की संख्या सबसे ज्यादा रही।
जैसे —
- गया, औरंगाबाद, भागलपुर, बेगूसराय, और पटना ग्रामीण क्षेत्र में लाखों नाम हटाए गए।
- वहीं, इन जिलों में इस बार 5% से 8% अधिक मतदान दर्ज हुआ है।
यानी, जिन इलाकों में SIR की कार्रवाई ज्यादा हुई, वहां मतदान प्रतिशत में भी उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई है।
क्या बढ़ा हुआ मतदान जनता की भागीदारी है या सांख्यिकीय भ्रम?
यह सवाल अब राजनीतिक बहस का विषय बन गया है।
कई दलों का कहना है कि SIR के कारण वोटिंग प्रतिशत “तकनीकी रूप से” बढ़ा है, न कि जनता के जोश से।
एक वरिष्ठ चुनाव विशेषज्ञ का कहना है:
जब वोटर लिस्ट से फर्जी नाम हटते हैं तो वोट डालने वाले असली वोटर का अनुपात बढ़ जाता है। यह गणितीय रूप से स्वाभाविक है, लेकिन इससे यह नहीं कहा जा सकता कि ज्यादा लोग वोट करने पहुंचे।”
हालांकि, कई सामाजिक संगठनों का यह भी तर्क है कि इस बार महिलाओं और युवाओं की बढ़ी हुई भागीदारी ने भी मतदान को वास्तव में ऊंचा किया है।
SIR का असर दलों के गणित पर भी
SIR ने केवल आंकड़ों को नहीं, बल्कि राजनीतिक समीकरणों को भी प्रभावित किया है।
चूंकि अब वोटर लिस्ट से फर्जी नाम हट चुके हैं, इसलिए
- “घोस्ट वोटिंग”
- “बूथ कैप्चरिंग”
और - “डुप्लीकेट वोटिंग”
की संभावनाएं काफी घट गई हैं।
राजनीतिक रणनीतिकारों के अनुसार,
इससे उन क्षेत्रों में असर पड़ेगा जहां अब तक फर्जी वोटिंग के सहारे परिणाम प्रभावित होते थे।”
विशेषकर ग्रामीण और सीमावर्ती इलाकों में अब चुनाव का परिणाम अधिक सटीक और निष्पक्ष होने की संभावना है।
क्या SIR बिहार के लिए मॉडल बन सकता है?
चुनाव आयोग के अधिकारियों का कहना है कि अगर SIR का परिणाम बिहार में सकारात्मक रहा, तो इसे अन्य राज्यों में भी लागू किया जाएगा।
यह कदम भारत के चुनावी इतिहास में “मतदाता सूची की पारदर्शिता का सबसे बड़ा सुधार” साबित हो सकता है।
एक अधिकारी ने बताया,
बिहार में इस प्रक्रिया ने यह दिखा दिया है कि जब मतदाता सूची सटीक होती है, तो लोकतंत्र की सच्ची तस्वीर सामने आती है।”
-1762500609045.webp)
महिलाओं और युवाओं ने भी बढ़ाई भागीदारी
बंपर वोटिंग का एक और पहलू है — महिलाओं की बढ़ती उपस्थिति।
इस बार कई जिलों में महिलाओं ने पुरुषों से अधिक मतदान किया।
2020 में जहां महिलाओं का मतदान प्रतिशत 59.6 था, वहीं इस बार यह 65% के पार पहुंच गया।
युवाओं में भी पहली बार वोट डालने वालों की संख्या करीब 20 लाख से अधिक रही।
इस वजह से मतदान में जोश और उत्साह दोनों दिखाई दिया।
बिहार में SIR के बाद का पहला चुनाव — नया चुनावी युग?
बिहार का यह चुनाव केवल विधानसभा का नहीं, बल्कि नई मतदाता सूची प्रणाली की परीक्षा भी है।
SIR प्रक्रिया ने यह साबित किया है कि अगर लिस्ट साफ और पारदर्शी हो, तो लोकतंत्र की सच्ची तस्वीर उभरकर सामने आती है।
अब तक के संकेत बताते हैं कि SIR के बाद हुए पहले चुनाव ने
- वोटिंग प्रतिशत को रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचाया,
- फर्जी नामों की समस्या खत्म की,
- और चुनावी निष्पक्षता को मजबूत किया।