संक्षेप (Summary) : Greater Noida में GNIDA कर्मचारियों पर तालाबों में कूड़ा डालकर उन्हें भरने का आरोप लगा है। पर्यावरणविद प्रदीप डाहलिया ने NGT आदेश उल्लंघन की शिकायत कर उच्च-स्तरीय जांच और दोषियों पर कार्रवाई की मांग की है। ग्रामीणों का आरोप है कि तालाब खत्म किए जा रहे हैं जिससे पर्यावरण और भू-जल स्तर पर गंभीर खतरा पैदा हो रहा है।
अवैध कब्ज़ा गौतम बुद्ध नगर के ग्रेटर नोएडा क्षेत्र में पर्यावरण संरक्षण से जुड़े एक गंभीर मामले ने प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। पर्यावरणविद प्रदीप डाहलिया ने ग्रेटर नोएडा औद्योगिक विकास प्राधिकरण (GNIDA) के मुख्य कार्यपालक अधिकारी को एक विस्तृत पत्र भेजकर आरोप लगाया है कि प्राधिकरण के कर्मचारी गांवों के तालाबों में कूड़ा डालकर उन्हें भरने का कार्य कर रहे हैं। यह काम न केवल पर्यावरणीय दृष्टि से विनाशकारी है बल्कि राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) के स्पष्ट आदेशों का खुला उल्लंघन भी है।यह मामला अब ग्रामीणों, पर्यावरण कार्यकर्ताओं और स्थानीय समाज में बड़ी चिंता का विषय बन गया है, क्योंकि तालाब गांवों की जल-व्यवस्था, वर्षा जल संरक्षण, भू-जल स्तर और प्राकृतिक संतुलन के लिए महत्वपूर्ण होते हैं।
वैदपुरा, खेड़ी, सैनी सहित कई गांव प्रभावित—प्राधिकरण पर गंभीर आरोप
शिकायत के अनुसार, ग्रेटर नोएडा क्षेत्र के कई गांवों—जैसे वैदपुरा, खेड़ी, सैनी और आसपास के अन्य क्षेत्रों में—GNIDA के सफाई कर्मचारी और संबंधित अधिकारी तालाबों में लगातार कूड़ा-कचरा डाल रहे हैं।
स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि कई बार यह काम रात के समय या प्राधिकरण की गाड़ियों द्वारा किया जाता है, ताकि किसी को पता न चले।
यह विरोधाभास भी सामने आया है कि एक ओर अखबारों और माध्यमों में यह प्रचारित किया जा रहा है कि ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण तालाबों का पुनर्स्थापन और सौंदर्यीकरण कर रहा है, जबकि जमीन पर इसके बिल्कुल विपरीत गतिविधि सामने आ रही है।
NGT आदेश का खुला उल्लंघन—पर्यावरणविद ने लगाया बड़ा आरोप

शिकायत में यह स्पष्ट उल्लेख किया गया है कि तालाबों में कूड़ा डालना NGT के आदेश नंबर O.A. 177/2022 का गंभीर उल्लंघन है।
यह मामला था—
“Abhisht Kusum Gupta vs State of Uttar Pradesh & Ors.”
दिनांक 16 मई 2024 को पारित आदेश में NGT ने स्पष्ट निर्देश दिए थे:
“सभी तालाबों, झीलों और प्राकृतिक जल स्रोतों की नियमित सफाई, पुनर्स्थापन और संरक्षण सुनिश्चित किया जाए तथा किसी भी प्रकार के अवैध भराव, कूड़ा डालने या निर्माण पर पूर्ण रोक लगाई जाए।”
पर्यावरणविद का आरोप है कि ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण के अधीनस्थ कर्मचारी इस आदेश की अवहेलना करते हुए तालाबों को खत्म करने का कार्य कर रहे हैं, जो कानूनन दंडनीय है।
पर्यावरणीय नुकसान—तालाब भरने से बढ़ रही बड़ी समस्या
तालाबों और प्राकृतिक जल स्रोतों के भरने से जो नुकसान हो रहा है, वह सिर्फ एक क्षेत्र तक सीमित नहीं है बल्कि पूरे इकोसिस्टम पर असर डालता है। शिकायतकर्ता के अनुसार तालाबों में कूड़ा डालने से:
- भू-जल स्तर तेजी से नीचे जा रहा है
तालाब वर्षा जल को धरती में समाहित करने में बड़ी भूमिका निभाते हैं। - ग्रामीण इलाकों में जल निकासी बिगड़ रही है
बारिश के दिनों में जलभराव की समस्या अधिक बढ़ जाएगी। - स्थानीय जैव विविधता पर खतरा
तालाबों में रहने वाले जीव-जंतु और पक्षियों का निवास क्षेत्र नष्ट हो रहा है। - कूड़ा भरने से बदबू व प्रदूषण
आसपास के क्षेत्रों में बीमारी फैलने का खतरा बढ़ जाता है। - पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 का उल्लंघन
इस तरह की गतिविधियां सीधे-सीधे कानूनी अपराध मानी जाती हैं।
तालाब भरना सार्वजनिक उपद्रव”—IPC की धारा 268 के तहत भी अपराध
शिकायत में यह भी बताया गया है कि तालाबों में कूड़ा डालना सार्वजनिक उपद्रव (Public Nuisance) की श्रेणी में आता है, जो भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 268 के तहत दंडनीय अपराध है।
यह धारा कहती है कि:

किसी भी ऐसे कार्य को जो समाज को नुकसान पहुंचाए, स्वास्थ्य, सुरक्षा, सुविधा या जीवन की गुणवत्ता को प्रभावित करे, सार्वजनिक उपद्रव माना जाएगा।”
ग्रामीणों का कहना है कि प्रशासन की निगरानी के अभाव में कर्मचारी मनमाने तरीके से तालाबों का अस्तित्व समाप्त कर रहे हैं।
पर्यावरणविद प्रदीप डाहलिया ने उठाई आवाज—पत्र में मांगे समाधान
पर्यावरण कार्यकर्ता और समाजसेवी प्रदीप डाहलिया ने अपने पत्र में कई महत्वपूर्ण माँगें रखी हैं, जिनमें शामिल हैं:
पूरे मामले की उच्च-स्तरीय जांच
जिला प्रशासन, पर्यावरण विभाग और NGT मॉनिटरिंग कमेटी को मिलकर जांच करनी चाहिए।
दोषी कर्मचारियों व अधिकारियों पर कार्रवाई
अनुशासनात्मक और दंडात्मक दोनों प्रकार की कार्रवाई की मांग की गई है।
सभी तालाबों का सर्वे कर रिपोर्ट सार्वजनिक करना
यह जानना आवश्यक है कि कौन-कौन से तालाब अवैध रूप से भरे जा रहे हैं।
भविष्य में तालाबों में कूड़ा डालने पर पूर्ण प्रतिबंध
सख्त निगरानी के साथ स्थायी समाधान की मांग की गई है।
प्रदीप डाहलिया ने इस मामले को जनहित और पर्यावरण सुरक्षा से सीधे जुड़ा मुद्दा बताया है और प्रशासन से तत्काल संज्ञान लेने की अपील की है।
ग्रामीणों में बढ़ रहा आक्रोश तालाब खत्म होंगे तो गांव खत्म हो जाएगा”
गांवों के लोगों ने भी इस मामले पर नाराज़गी दिखाई है। ग्रामीण कहते हैं:

- “तालाब हमारे गांव की पहचान हैं।”
- “पानी का स्रोत खत्म होगा तो आने वाली पीढ़ियों पर संकट आएगा।”
- “प्राधिकरण खुद तालाब भरता है और कहता है कि वे तालाब बचा रहे हैं!”
कई ग्रामीणों ने बताया कि पहले भी इस तरह की गतिविधियाँ देखी गई थीं, लेकिन शिकायत करने के बाद भी कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।
क्या करेगा प्रशासन?—अब सबकी निगाहें GNIDA पर
अब प्रश्न यह है कि—
- क्या प्राधिकरण इस गंभीर शिकायत पर तुरंत एक्शन लेगा?
- क्या दोषी कर्मचारी चिह्नित किए जाएंगे?
- क्या तालाबों को बचाने के लिए एक व्यापक योजना लागू होगी?
ग्रेटर नोएडा क्षेत्र तेजी से शहरीकरण के दौर से गुजर रहा है, लेकिन इसी विकास के नाम पर प्राकृतिक संसाधनों का विनाश बढ़ता जा रहा है।
यदि तालाबों को कूड़े से भरा गया, तो आने वाले वर्षों में पानी की कमी, बाढ़ जैसी घटनाएं, और पर्यावरणीय असंतुलन गंभीर समस्या बन सकते हैं।