Tuesday, February 3, 2026

Delhi blast साजिश का खुलासा: आतंकी मॉडिफाइड ड्रोन और इम्प्रोवाइज्ड रॉकेट से करना चाहते थे बड़ा हमला

by Sujal
Delhi blast साजिश में चौंकाने वाला खुलासा—आतंकियों ने हमास मॉडल पर मॉडिफाइड ड्रोन, इम्प्रोवाइज्ड रॉकेट और आत्मघाती UAV से राजधानी में बड़ा हमला करने की योजना बनाई थी। एक्सपर्ट्स ने बताया कि ये हथियार कितने घातक हो सकते थे।

संक्षेप (Summary : Delhi blast लाल किले के पास हुए धमाके की जांच में बड़ा खुलासा हुआ है। ‘सफेदपोश’ आतंकी हमास मॉडल पर मॉडिफाइड ड्रोन और इम्प्रोवाइज्ड रॉकेट से दिल्ली में बड़ा हमला करना चाहते थे। ये हथियार बेहद सस्ते, आसानी से तैयार होने वाले और 25 किलोमीटर तक मार करने वाले होते हैं। एक्सपर्ट्स के अनुसार, एक मिनट में तीन रॉकेट दागे जा सकते हैं और आत्मघाती ड्रोन भी इस्तेमाल किए जाने वाले थे।
अगर यह हमला सफल होता, तो भीड़भाड़ वाले इलाकों में भारी तबाही हो सकती थी। NIA और स्पेशल सेल अब पूरी साजिश के नेटवर्क की जांच में जुटी हैं।

Delhi blast साजिश में बड़ा खुलासा: मॉडिफाइड ड्रोन और इम्प्रोवाइज्ड रॉकेट से ‘हमास मॉडल’ पर हमला करना चाहते थे आतंकी

नई दिल्ली:
राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में लाल किले के पास हुए धमाके की जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, वैसे-वैसे इस पूरी साजिश का खौफनाक रूप सामने आता जा रहा है। पहले यह माना जा रहा था कि यह एक सामान्य IED ब्लास्ट हो सकता है, लेकिन जांच एजेंसियों ने जब पूरी कहानी को जोड़ना शुरू किया, तो सामने आया कि यह एक बेहद संगठित, तकनीकी रूप से प्रशिक्षित और बड़े हमले की योजना का हिस्सा था।
इस साजिश को अंजाम देने वाले ‘सफेदपोश’ आतंकी हमास की तरह कम लागत वाले लेकिन अत्यधिक खतरनाक ड्रोन और इम्प्रोवाइज्ड रॉकेट का इस्तेमाल करना चाहते थे। इन हथियारों को लेकर एक्सपर्ट्स ने जो जानकारी दी है, वह इस बात की पुष्टि करती है कि अगर यह हमला सफल होता, तो राजधानी अभूतपूर्व तबाही का सामना कर सकती थी।

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हमले का पूरा प्लान: छोटे लेकिन विनाशकारी हथियारों का इस्तेमाल

जांच एजेंसियों को पता चला है कि आतंकी किसी भी बड़े संगठन की तरह महंगे हथियारों पर निर्भर नहीं थे। उनका पूरा प्लान बिल्कुल हमास की तकनीक पर आधारित था—मॉडिफाइड कमर्शियल ड्रोन, सस्ते लेकिन तेजी से तैयार होने वाले ग्लाइडिंग रॉकेट और आत्मघाती UAV।
इन हथियारों की खासियत यह होती है कि इन्हें बनाने में ज्यादा लागत नहीं लगती और इन्हें एक जगह से दूसरी जगह ले जाना बेहद आसान होता है। यही वजह है कि आतंकियों ने इन्हें अपने हमले की मुख्य रणनीति का हिस्सा बनाया।


एक्सपर्ट्स का खुलासा: ये हथियार इतने खतरनाक क्यों?

INDOWINGS कंपनी के संस्थापक और डिफेंस टेक्नोलॉजी एक्सपर्ट पारस जैन के अनुसार, आतंकी संगठन अक्सर ग्लाइडिंग रॉकेट्स का इस्तेमाल करते हैं, क्योंकि उनके विंग्स उड़ान को स्थिर करते हैं और उन्हें लंबी दूरी पर सटीक दिशा में पहुंचाते हैं।
उन्होंने बताया कि ये रॉकेट्स गाइडेड मिसाइल की तुलना में बेहद सस्ते होते हैं, लेकिन तबाही के मामले में किसी भी बड़े हथियार से कम नहीं। इन्हें शहरों या भीड़भाड़ वाले इलाकों में टारगेट पर मारने के लिए डिजाइन किया जाता है।


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20 सेकंड में फायर, 25 किलोमीटर तक मार—हमले की रफ्तार डराने वाली थी

इन इम्प्रोवाइज्ड रॉकेट्स की सबसे खतरनाक ताकत उनकी स्पीड है। एक्सपर्ट्स के अनुसार—

  • एक रॉकेट को लॉन्च करने में सिर्फ 20 सेकंड लगते हैं।
  • एक मिनट में 3 रॉकेट दागे जा सकते हैं।
  • इनकी रेंज करीब 25 किलोमीटर होती है।
  • ये एक बार में 2 से 50 किलो तक विस्फोटक ले जा सकते हैं।

इसका अर्थ यह है कि अगर आतंकी शहर के किसी कोने में बैठकर भी हमला करते, तो कुछ ही सेकंड में भीड़भाड़ वाले इलाके को तबाह किया जा सकता था।

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इम्प्रोवाइज्ड रॉकेट्स—सटीकता और तबाही के अनोखे हथियार

ये रॉकेट्स अक्सर कंप्रेस्ड गैस से चलते हैं, जो इन्हें तेज रफ्तार देती है। इसके विंग्स उन्हें हवा में स्थिर रखते हैं ताकि ये निशाने से भटके नहीं।
इनकी सबसे बड़ी घातक ताकत यह है कि टारगेट पर पहुंचने के बाद यह छोटे-छोटे टुकड़ों में टूट जाते हैं और चारों तरफ शार्पनेल फैलकर भारी नुकसान पहुंचाते हैं।
यही कारण है कि इन्हें शहरी इलाकों में मिड-रेंज टारगेटिंग के लिए सबसे ज्यादा इस्तेमाल किया जाता है।


रेल से लॉन्च होने वाला ड्रोन—नई तकनीक, बड़ा खतरा

जांच में यह भी सामने आया है कि आतंकी रेल से लॉन्च होने वाले इम्प्रोवाइज्ड UAV बनाने की तैयारी में थे। ये UAV आम ड्रोन जैसे नहीं होते, बल्कि इनमें विशेष बदलाव किए जाते हैं ताकि ये भारी मात्रा में विस्फोटक ले सकें।
इन्हें रेलिंग के जरिए स्लाइड कराकर हवा में छोड़ा जा सकता है, जिससे इन्हें जमीन से सीधे लॉन्च नहीं करना पड़ता और पकड़े जाने की संभावना कम हो जाती है।


क्यों हमास के पसंदीदा हैं ऐसे हथियार?

इन हथियारों को आतंकी पसंद करते हैं क्योंकि—

  • बहुतेरे बनाएं जाएं तो बेहद सस्ते पड़ते हैं।
  • इन्हें एक जगह से दूसरी जगह ले जाना आसान होता है।
  • तैयार करने में ज्यादा तकनीकी संसाधन नहीं लगते
  • इन्हें ऑपरेट करने के लिए किसी बड़ी सैन्य ट्रेनिंग की जरूरत नहीं।
  • इन्हें जोड़ने और तैयार करने में कम समय लगता है।
  • हमलावर सुरक्षित दूरी से भी हमला कर सकता है।

यानी कम पैसे, कम समय और कम संसाधनों में भी बड़े पैमाने पर हमले किए जा सकते हैं।


आत्मघाती ड्रोन—कमर्शियल तकनीक का खतरनाक इस्तेमाल

सबसे खतरनाक हिस्सा यह है कि आतंकी आत्मघाती ड्रोन का भी इस्तेमाल करना चाहते थे।
ये ड्रोन टारगेट पर जाकर टकराते हैं और वहीं विस्फोट करते हैं। इनकी दो प्रमुख किस्में होती हैं—

  1. Suicide Drone – जो सीधे जाकर टकराता है।
  2. Payload Drone – जो ऊपर पहुंचकर ग्रेनेड या बम गिराता है।

इन ड्रोन को पैसिव आवाज़ में उड़ने के लिए बदला जाता है ताकि रडार और लोगों को पता न चले। इनके नीचे लगाए गए छोटे सिस्टम इन्हें बेहद साइलेंट बनाते हैं।


एक्सपर्ट्स की चेतावनी: एक व्यक्ति नहीं, पूरी टीम चाहिए

एक्सपर्ट्स के मुताबिक, ये हथियार खरीदना आसान है, लेकिन इन्हें हमला करने के लिए तैयार करना बेहद कठिन।
इसके लिए—

  • इंजीनियरिंग
  • इलेक्ट्रॉनिक्स
  • विस्फोटक असेंबली
  • GPS कंट्रोल
  • और रियल-टाइम मॉनिटरिंग

जैसी विशेषज्ञता चाहिए। यह काम किसी एक व्यक्ति के बस का नहीं होता। ऐसे हमलों के लिए बड़ी टीम और लंबी तैयारी की जरूरत होती है।
यही वजह है कि जांच एजेंसियां अब इस साजिश के पीछे जुड़े नेटवर्क को खंगाल रही हैं।


अगर दिल्ली में हमला होता तो नुकसान कितना होता?

दिल्ली जैसे घने इलाके में इन हथियारों का इस्तेमाल किया जाता—

  • चारों तरफ शार्पनेल फैलता।
  • मल्टी-रॉकेट अटैक से बचना लगभग असंभव होता।
  • भीड़भाड़ वाले बाजार, मेट्रो स्टेशन या ऐतिहासिक स्थलों पर भारी तबाही हो सकती थी।
  • 20–30 सेकंड के अंदर कई हमले किए जा सकते थे।

जांच एजेंसियों का मानना है कि आतंकियों का असली टारगेट जनता में अराजकता, दहशत और बड़े पैमाने पर जनहानि करना था।


दिल्ली में ‘हमास मॉडल’?—जांच एजेंसियों का बड़ा सवाल

जिस तरह हमास छोटे ड्रोन और मॉडिफाइड रॉकेट का इस्तेमाल कर इस्राइल में लगातार तबाही मचाता है, वही मॉडल यहां कॉपी किया जा रहा था।
कम लागत, तैयार करने में सरलता और बड़ी मारक क्षमता—यही इन हथियारों को खतरनाक बनाते हैं।
जांच एजेंसियां अब यह पता लगा रही हैं कि आतंकियों को तकनीकी मदद कहां से मिली और क्या ये किसी बड़े नेटवर्क से जुड़े थे।


फिलहाल जांच जारी—but खतरे की घंटी बज चुकी है

लाल किला ब्लास्ट भले ही छोटा दिखा हो, लेकिन इसके पीछे बड़े हमले की रूपरेखा छिपी थी। आतंकियों का इरादा दिल्ली में ऐसा हमला करने का था जो देश की सुरक्षा व्यवस्था को सीधा चुनौती दे सके।
फिलहाल NIA, दिल्ली पुलिस स्पेशल सेल और केंद्रीय एजेंसियां इस नेटवर्क को तोड़ने में जुटी हैं। कई गिरफ्तारियां हो चुकी हैं और कई और संदिग्धों पर नजर रखी जा रही है।
लेकिन एक बात साफ है—अगर यह हमला सफल होता, तो दिल्ली को ऐसे विनाश का सामना करना पड़ सकता था जिसकी कल्पना भी मुश्किल है।

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