Wednesday, February 4, 2026

Bihar elections नीतीश से नाराज वोट किसका खेल बिगाड़ेंगे? बिहार चुनाव में पीके बने सबसे बड़ा फैक्टर

by Sujal
Bihar elections 2025 में प्रशांत किशोर (पीके) बने एक्स फैक्टर। जानिए अगर पीके ने NDA या महागठबंधन के वोट काटे तो किसका खेल बनेगा और किसका बिगड़ेगा।

Bihar elections 2025: नीतीश से नाराज वोट किसको पड़ेंगे? पीके या महागठबंधन?

Bihar elections बिहार की सियासत में इस बार मुकाबला दो नहीं, तीन ध्रुवों के बीच दिखाई दे रहा है। एक ओर है NDA, दूसरी ओर महागठबंधन, और तीसरे मोर्चे पर हैं प्रशांत किशोर यानी पीके की पार्टी जनसुराज। सवाल यही है कि अगर पीके मैदान में हैं, तो इसका सीधा असर किस पर पड़ेगा — नीतीश कुमार, तेजस्वी यादव या दोनों पर?


पीके के आने से तिकोना हुआ बिहार का चुनावी चौसर

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राजनीतिक जानकारों का मानना है कि पीके के आने से बिहार का चुनावी चौसर तिकोना हो गया है। उनके हिस्से में जो भी वोट आएंगे, वह सीधे-सीधे NDA या महागठबंधन से ही कटेंगे।
इसलिए हर विश्लेषक की नजर इस बात पर टिकी है कि आखिर पीके किसका वोट काटेंगे, क्योंकि वही तय करेगा कि पटना की गद्दी किसके हिस्से जाएगी।


अगर पीके ने महागठबंधन के 5% वोट काटे

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वोट वाइब एजेंसी के आकलन के मुताबिक, अगर पीके की पार्टी को 10% वोट मिलते हैं और इसमें से 5% महागठबंधन से झटकते हैं, तो ऐसी स्थिति में NDA का वोट शेयर 42% और महागठबंधन का 34% रह जाएगा।
बाकी दलों को लगभग 15% वोट मिलेंगे।
इस हालात में साफ तौर पर महागठबंधन का नुकसान और NDA का फायदा नजर आता है।


अगर पीके ने NDA के 5% वोट काटे

अब अगर स्थिति उलटी हो और पीके NDA से 5% वोट ले जाएं, तो NDA का वोट शेयर घटकर 37% रह जाएगा जबकि महागठबंधन का वोट शेयर बढ़कर 39% हो जाएगा।
ऐसे में महागठबंधन बढ़त बना सकता है और सत्ता की रेस में आगे निकल सकता है।


2020 में मामूली अंतर से बनी थी सरकार

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बिहार विधानसभा चुनाव 2020 में NDA को 37.26% वोट मिले थे, जबकि महागठबंधन को 37.23%।
मतलब सिर्फ 11 हजार वोटों का फर्क सरकार बनाने और हारने का कारण बना।
यानी थोड़ा सा भी वोट प्रतिशत बदलना बड़ा राजनीतिक उलटफेर कर सकता है।


अगर पीके दोनों का वोट बराबर काटें

अगर पीके को 10% वोट मिलते हैं और वे NDA और महागठबंधन दोनों से 2.5-2.5% वोट झटकते हैं, तो नुकसान महागठबंधन का होगा।
ऐसे में NDA का वोट शेयर 39% और महागठबंधन का 36% रहेगा।
यानि पीके का असर चाहे जहां पड़े, फायदा NDA को मिलता दिख रहा है।


पीके कितने बड़े लड़ैया साबित होंगे?

सवाल यह भी है कि क्या प्रशांत किशोर को वाकई 10% वोट मिल पाएंगे?
उन्होंने पूरे राज्य में अपने उम्मीदवार उतारे हैं, लेकिन कुछ ने आखिरी वक्त में पार्टी छोड़ दी।
फिर भी पीके की रणनीति और जमीनी पैठ ने बिहार की राजनीति में हलचल मचा दी है।

पिछले तीन सालों से वह गांव-गांव जाकर जनता से सीधे जुड़ने की कोशिश कर रहे हैं।
पर राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि बिहार में किसी नई पार्टी को एक झटके में पहचान मिलना मुश्किल है।


नीतीश से नाराज वोटर किस ओर जाएंगे?

अब सबसे बड़ा सवाल यही है — नीतीश कुमार से नाराज वोटर किसे चुनेंगे?
अगर वही वोटर महागठबंधन के बजाय पीके को वोट देने लगते हैं, तो एंटी इनकमबेंसी वोट बंट जाएगा, जिसका सीधा फायदा NDA को होगा।


नतीजा चाहे जो हो, चुनाव तय जरूर करेंगे पीके

भले ही पीके की पार्टी चुनाव न जीते, लेकिन इतना तय है कि वे इस चुनाव की दिशा और दशा दोनों बदल सकते हैं।
नीतीश कुमार, तेजस्वी यादव और बीजेपी — तीनों को ही अब अपने वोट बैंक पर फिर से सोचने की जरूरत है, क्योंकि जनसुराज अब बिहार की राजनीति में ‘फैक्टर’ नहीं, ‘फोर्स’ बन चुका है।


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