संक्षेप (Summary) Seemanchal बिहार के सीमांचल और पूर्णिया क्षेत्र में 2025 के चुनाव नतीजों ने बड़ा राजनीतिक संदेश दिया है। NDA ने 7 में से 5 सीटें जीतकर दबदबा बनाया, जबकि AIMIM ने अमौर और बायसी की दोनों मुस्लिम बहुल सीटें फिर से अपने नाम कर लीं।इसके उलट महागठबंधन—राजद और कांग्रेस—का खाता तक नहीं खुला।
पप्पू यादव और जनसुराज के उदय सिंह (पप्पू सिंह) भी पूरी तरह असफल रहे और अपनी-अपनी पार्टियों की एक भी सीट नहीं बचा पाए, यहाँ तक कि जनसुराज के सभी उम्मीदवारों की जमानत भी जब्त हो गई।मुस्लिम वोट AIMIM की तरफ शिफ्ट हुए, जबकि NDA को विकास और जातीय संतुलन वाले वोटरों का मजबूत समर्थन मिला।
इस तरह सीमांचल में राजनीति का नया समीकरण बना है—
NDA + AIMIM बनाम महागठबंधन,
और महागठबंधन को सबसे बड़ी पराजय का सामना करना पड़ा है।
सीमांचल में न पप्पू चले, न तेजस्वी—AIMIM का करिश्मा और NDA की बाजी, महागठबंधन हुआ साफ
Seemanchal बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के सबसे दिलचस्प नतीजे सीमांचल क्षेत्र से सामने आए हैं।
पूर्णिया, जिसे सीमांचल की राजनीतिक हृदयस्थली माना जाता है, ने इस बार एक बार फिर साबित कर दिया कि यहां का चुनावी मिज़ाज पूरी तरह अलग है—और भविष्य की राजनीति की दिशा बदल सकता है।
जहाँ NDA ने 7 में से 5 सीटों पर शानदार जीत दर्ज की, वहीं AIMIM ने अपने दोनों सीटों (अमौर और बायसी) को फिर से अपने नाम कर लिया।इसके उलट महागठबंधन—राजद और कांग्रेस—दोनों का यहां खाता तक नहीं खुला।
और सबसे हैरान करने वाली बात यह रही कि सीमांचल की राजनीति में “किंगमेकर” माने जाने वाले पप्पू यादव और जनसुराज प्रमुख उदय सिंह (पप्पू सिंह) इस बार पूरी तरह फेल साबित हुए।

पूर्णिया में NDA का दबदबा—5 सीटों पर जबरदस्त जीत
पूर्णिया जिले में कुल 7 विधानसभा सीटें हैं।
मतदान के बाद तस्वीर साफ हुई कि यहां NDA का दबदबा पूरी तरह बना रहा:
- धमदाहा – जीत: JDU की लेशी सिंह
- बनमनखी (सु) – जीत: भाजपा के कृष्ण कुमार ऋषि
- पूर्णिया सदर – जीत: भाजपा के विजय खेमका
- कसबा – जीत: LJP(R) के नितेश सिंह (कांग्रेस से छीन ली सीट)
- रुपौली – जीत: JDU के कलाधर मंडल (निर्दलीय से छीन ली सीट)
इन जीतों ने महागठबंधन को पूरी तरह किनारे कर दिया।
NDA ने न केवल अपनी पुरानी सीटों को बचाया बल्कि कांग्रेस और निर्दलीय उम्मीदवारों से भी सीटें छीन लीं, जो इसकी बड़ी रणनीतिक सफलता मानी जा रही है।
AIMIM का करिश्मा—अमौर और बायसी में फिर से धमाल
AIMIM ने सीमांचल में एक बार फिर यह साबित किया कि उसका प्रभाव घटा नहीं, बल्कि मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में वह मजबूत विकल्प बन चुकी है।
अमौर
- जीत: AIMIM प्रदेश अध्यक्ष अख्तरुल इमान
- कांग्रेस के प्रत्याशी को हराया
- 2020 में भी यहीं से जीते थे

बायसी
- जीत: AIMIM के गुलाम सरवर
- राजद उम्मीदवार को मात दी
- 2020 में यहां मो. रुकनुद्दीन AIMIM से जीते थे, बाद में राजद में शामिल हुए
AIMIM ने दोनों सीटें बरकरार रखकर यह संकेत दिया कि सीमांचल में उसका वोट बैंक स्थिर है और महागठबंधन से ज्यादा भरोसा AIMIM पर किया जा रहा है।
मुस्लिम मतदाताओं ने वक्फ बिल, SIR और स्थानीय मुद्दों पर अधिक विश्वास AIMIM में दिखाया, जिससे कांग्रेस और राजद बुरी तरह पिछड़ गए।
महागठबंधन का पूरा सफाया—राजद और कांग्रेस का खाता नहीं खुला
सीमांचल में तेजस्वी यादव की राजद और कांग्रेस को जिस तरह की हार मिली है, वह 2025 चुनाव का सबसे बड़ा संदेश है।
कांग्रेस की स्थिति
- 2020 में जीती कसबा सीट भी गंवा दी
- अमौर, पूर्णिया सदर और बनमनखी में बुरी हार
- तीनों नए प्रत्याशी मैदान में टिक नहीं पाए
आफाक आलम (पूर्व विजेता) इस बार टिकट नहीं मिलने पर निर्दलीय लड़े, लेकिन चुनाव जीतने के बजाय पूरा समीकरण ही बिगाड़ बैठे।
राजद की स्थिति
- किसी भी सीट पर जीत नहीं
- बायसी, धमदाहा और रुपौली में हार
- 2020 में जीती कोई सीट इस बार नहीं मिली
राजद को मुस्लिम-यादव समीकरण का लाभ यहां नहीं मिला। AIMIM और NDA दोनों ने इसकी संभावनाओं को खत्म कर दिया।

पप्पू यादव—सीमांचल के ‘वॉरियर’ कहे जाने वाले नेता की बड़ी हार
सीमांचल में कांग्रेस के संकटमोचक माने जाने वाले पप्पू यादव इस बार बिल्कुल असरदार साबित नहीं हुए।
उनका हेलीकॉप्टर प्रचार, रणनीति और मीडिया हाइलाइट—कुछ भी काम नहीं आया।
- पप्पू यादव 7 में से 5 सीटों पर कांग्रेस को बढ़त दिलाने का दावा कर रहे थे
- पर किसी भी सीट पर कांग्रेस नहीं जीती
यह उनके राजनीतिक प्रभाव में भारी गिरावट दर्शाता है।
यह कहना गलत नहीं होगा कि सीमांचल में पप्पू यादव की पकड़ पहले जैसी नहीं रह गई है।
पप्पू सिंह (उदय सिंह) भी बुरी तरह फेल—जनसुराज पार्टी को करारी हार
उदय सिंह, जिन्हें लोग पप्पू सिंह के नाम से जानते हैं, पूर्णिया क्षेत्र के लोकप्रिय पूर्व सांसद रहे हैं।
उन्होंने जनसुराज पार्टी का गठन कर चुनाव लड़ने का फैसला किया था।
लेकिन परिणाम बेहद निराशाजनक रहे:
- जनसुराज ने सातों सीटों पर चुनाव लड़ा
- लेकिन एक भी सीट नहीं मिली
- किसी भी प्रत्याशी की जमानत तक नहीं बची
यह जनसुराज और पप्पू सिंह की अब तक की सबसे बड़ी राजनीतिक हार मानी जा रही है।
यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि:
- क्या जनसुराज सीमांचल में प्रभावशाली विकल्प नहीं बन पाया?
- क्या उदय सिंह की राजनीतिक पकड़ खत्म हो चुकी है?
- क्या जनता ने नए प्रयोगों को खारिज कर दिया?
जवाब नतीजों में साफ दिख रहा है—सीमांचल ने जनसुराज को भारी नकारा है।
क्या महागठबंधन से AIMIM को दूर रखना भारी गलती थी?
सियासी गलियारों में एक सवाल तेजी से उठ रहा है:
क्या महागठबंधन ने AIMIM को साथ न लेकर बड़ी राजनीतिक भूल की?
यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है:
- मुस्लिम वोट AIMIM की ओर शिफ्ट हुए
- राजद-कांग्रेस के कोर वोटर AIMIM की ओर चले गए
- सीमांचल में महागठबंधन का पूरा सफाया हुआ
राजद ने बायसी में उम्मीदवार भी बदल दिया, लेकिन AIMIM के सामने जीत नहीं पाई।
अगर AIMIM महागठबंधन के साथ होती, तो सीमांचल का आंकड़ा पूरी तरह बदल सकता था।
सीमांचल में राजनीति का नया समीकरण—NDA + AIMIM बनाम महागठबंधन
2025 के नतीजों ने यह साफ कर दिया है कि सीमांचल में नई राजनीतिक धुरी बन चुकी है:
➤ NDA का विकास + जातीय संतुलन
➤ AIMIM का मजबूत मुस्लिम वोट बैंक
इन दोनों के सामने महागठबंधन कमजोर पड़ गया है।
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