संक्षेप में खबर: Yuvraj नोएडा के सेक्टर-150 में इंजीनियर युवराज मेहता की मौत ने जिले के आपदा प्रबंधन की पोल खोल दी। हादसे वाले दिन ही प्रशासन मॉक ड्रिल और बैठकों में अलर्ट दिखा, लेकिन जमीन पर कोई तैयारी नहीं थी। कई बैठकों और ‘आपदा मित्र’ प्रशिक्षण के दावों के बावजूद मौके पर कोई प्रशिक्षित रेस्क्यू टीम नहीं पहुंची। घटना ने प्रशासनिक लापरवाही और सिस्टम की नाकामी को उजागर कर दिया।
Yuvraj के साथ डूब गईं कागजों की ‘तैयारियां’
Yuvraj नोएडा।सेक्टर-150 में 27 वर्षीय सॉफ्टवेयर इंजीनियर युवराज मेहता की दर्दनाक मौत ने सिर्फ एक परिवार की खुशियां नहीं छीनीं, बल्कि सरकारी दावों और बैठकों की पोल भी खोल दी। जिस गड्ढे में युवराज की कार डूबी, उसी में कागजों पर मजबूत दिख रहा डिजास्टर मैनेजमेंट सिस्टम भी डूब गया।
जिस दिन हादसा हुआ, उसी दिन बैठक में था ‘अलर्ट’

16 जनवरी की रात युवराज पानी में डूबकर जान गंवा बैठा। हैरानी की बात यह है कि उसी दिन दोपहर जिलाधिकारी मेधा रूपम ने कलेक्ट्रेट सभागार में ब्लैकआउट मॉक ड्रिल और आपदा प्रबंधन की तैयारियों को लेकर बैठक की थी।
बैठक में अपर जिलाधिकारी न्यायिक, सीएफओ, अपर मुख्य चिकित्सा अधिकारी, जिला आपदा विशेषज्ञ समेत कई विभागों के अधिकारी मौजूद थे। निर्देश दिए गए कि आपदा प्रबंधन को लेकर जागरूकता बढ़ाई जाए और सभी विभाग अलर्ट मोड में रहें।
सुर्खियों में आया मामला तो जिम्मेदारी से पल्ला?

युवराज की मौत के बाद जब मामला सुर्खियों में आया, तो प्रशासनिक जवाबदेही पर सवाल उठने लगे। आरोप है कि डीएम ने आपदा प्रबंधन विभाग को पुलिस के अधीन बताकर जिम्मेदारी से बचने की कोशिश की।
हकीकत यह रही कि सेक्टर-150 की लापरवाही भरी व्यवस्था ने न केवल एक युवक की जान ली, बल्कि यूपी पुलिस की साख और अधिकारियों की संवेदनशीलता पर भी सवाल खड़े कर दिए।
बैठकों का दौर, लेकिन जमीन पर सन्नाटा
30 जुलाई 2025 को आईएएस मेधा रूपम ने गौतमबुद्धनगर के जिलाधिकारी का पदभार संभाला था।
इसके बाद—
- अगले ही दिन आपदाओं के प्रति जागरूकता बढ़ाने के निर्देश
- एनडीआरएफ, एसडीआरएफ, अग्निशमन, स्वास्थ्य और पुलिस के साथ मॉक ड्रिल की बातें
- 18 अगस्त को बाढ़ की तैयारियों पर समीक्षा बैठक
- 20 अगस्त को नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट की सुरक्षा व आपदा प्रबंधन पर चर्चा
- 22 अगस्त को जिला आपदा प्रबंधन समिति की तीसरी बैठक
करीब छह महीनों में 8 से 10 बैठकें हुईं, लेकिन इन सबके बावजूद सेक्टर-150 जैसे इलाकों में न सुरक्षा इंतजाम थे, न चेतावनी बोर्ड, न प्रशिक्षित रेस्क्यू टीम।
35 ‘आपदा मित्र’, लेकिन युवराज के लिए कोई नहीं
जिला आपदा प्रबंधन विभाग ने 22 नवंबर को आपदा मित्र परियोजना के तहत स्वयंसेवकों को प्रशिक्षण देने का दावा किया था।
पहले 75 स्वयंसेवकों को लखनऊ भेजा गया, फिर 34 आपदा मित्रों को ट्रेनिंग दी गई।
लेकिन सच्चाई यह है कि युवराज की जान बचाने के वक्त मौके पर एक भी प्रशिक्षित कर्मी मौजूद नहीं था।
पिता का दर्द और सिस्टम की खामोशी
आज युवराज के पिता राजकुमार मेहता की तरह हर पिता यह सोचने को मजबूर है कि अगर हादसे के वक्त सिस्टम साथ देता, तो शायद कहानी कुछ और होती।
इस पूरे मामले में जिलाधिकारी मेधा रूपम से उनका पक्ष जानने के लिए फोन से संपर्क किया गया, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला।
सवाल वही—जवाब कब?
युवराज की मौत ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि
क्या आपदा प्रबंधन सिर्फ फाइलों और बैठकों तक सीमित है?
और क्या किसी और युवराज की जान जाने के बाद ही सिस्टम जागेगा?