संक्षेप (Summary) बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में रिकॉर्ड 69.1% मतदान हुआ है और महिलाओं की भागीदारी भी 71.6% तक पहुंची है। हालांकि यह आंकड़े बड़े बदलाव का संकेत लगते हैं, लेकिन असल कारण अलग हैं।
SIR प्रक्रिया में 44 लाख वोटरों के नाम कटने से कुल मतदाता घटे, जिससे प्रतिशत अपने-आप बढ़ गया। साथ ही महिलाओं पर चुनावी फोकस, जन सुराज जैसी नई पार्टी की एंट्री, अल्पसंख्यक समुदाय की लामबंदी और छठ–दीवाली जैसे त्योहारों के बीच मतदान होने से वोटिंग बढ़ी
Bihar विधानसभा चुनाव 2025 में रिकॉर्डतोड़ मतदान ने सबका ध्यान अपनी ओर खींचा है। चुनाव आयोग के अनुसार दोनों चरणों को मिलाकर 69.1 प्रतिशत वोटिंग दर्ज की गई, जो 2020 की तुलना में लगभग 12 प्रतिशत ज्यादा है। महिलाओं की भागीदारी तो और भी ज्यादा बढ़कर 71.6 प्रतिशत पहुंच गई।
दिखने में यह उत्साहजनक आंकड़ा है। लेकिन क्या यह सचमुच राजनीतिक परिवर्तन का संकेत है? या फिर इसके पीछे कुछ ऐसे तथ्य छिपे हैं, जो इस रिकॉर्ड को पूरी तरह समझने के लिए ज़रूरी हैं?इस रिपोर्ट में हम जानेंगे कि इस बार वोटिंग बढ़ने का असली मतलब क्या है, और क्यों यह डेटा उतना सीधा नहीं जितना पहली नजर में लगता है।
रिकॉर्ड वोटिंग—क्या यह नए राजनीतिक बदलाव का संकेत है?
किसी भी लोकतंत्र में उच्च वोटिंग प्रतिशत आमतौर पर जनता के राजनीतिक उत्साह का प्रतीक माना जाता है। लेकिन बिहार में यह तस्वीर थोड़ी अलग है।
इतिहास उठाकर देखें तो:
- 1990 में मंडल कमीशन के समय बिहार में लगभग 60% मतदान हुआ था।
- 2005 तक यह गिरकर 46.5% तक पहुंच गया।
- इसके बाद लगातार वोटिंग प्रतिशत बढ़ा:
- 2010 में 52.7%
- 2015 में 56.3%
- 2020 में 57.29%
इसलिए 2025 में लगभग 69% वोटिंग का आंकड़ा, हालांकि रिकॉर्ड है, लेकिन यह वृद्धि उतनी अचानक नहीं जितनी दिखती है।
2020 चुनाव: कोविड का असर और कम वोटिंग
2020 में कोविड-19 के कारण लोगों का स्वास्थ्य और सुरक्षा सबसे बड़ी चिंता थी।
- मास्क, दूरी और संक्रमण के डर के बीच
- कई मतदाताओं ने मतदान केंद्रों पर जाने से परहेज किया
- प्रवासी मजदूरों की बड़ी संख्या बिहार से बाहर थी
इसलिए 2025 में दिख रही बढ़ोतरी का पहला कारण यह है कि 2020 का बेंचमार्क सामान्य नहीं था।
वोटर लिस्ट में 44 लाख नाम कटे—वोटिंग प्रतिशत अचानक बढ़ने का असली कारण

यह वह फैक्टर है, जिसे बहुत कम लोग जानते हैं लेकिन चुनाव परिणाम को समझने के लिए सबसे महत्वपूर्ण है।
2025 में बिहार की मतदाता सूची 7.89 करोड़ से घटकर 7.45 करोड़ रह गई।
यानी कुल 44 लाख वोटर (5.6%) मतदाता सूची से हट गए।
कारण बताया गया—
SIR (Statutory Revision of Electoral Roll) प्रक्रिया जिसके तहत डुप्लीकेट, मृतक और बाहर शिफ्ट हुए वोटरों के नाम काटे गए।
अब मान लीजिए, मतदाता कम हो जाएं तो…
वोटिंग प्रतिशत अपने-आप बढ़ जाता है
चाहे नए मतदाता उतने ही क्यों न हों जितने पहले थे।
मतदान की वास्तविक संख्या देखें तो 90 लाख नए वोटर सूची में जुड़े हैं, पर अगर प्राकृतिक वृद्धि को देखें (25–30 लाख सामान्य वृद्धि जो हर चुनाव में होती है), तो इस बार वास्तविक वृद्धि लगभग 65 लाख है, जो कुल वोट का 8% है।
मतलब—
रिकॉर्ड वोटिंग का बड़ा हिस्सा सिर्फ आंकड़ों का खेल है, वास्तविक उत्साह उतना नहीं जितना दिखता है।
महिलाओं की भारी भागीदारी—क्या यह नया राजनीतिक संकेत है?
71% से अधिक महिलाओं द्वारा मतदान करना उल्लेखनीय है।
दो प्रमुख कारण:
इस चुनाव का फोकस महिलाओं पर रहा
- महागठबंधन से लेकर एनडीए तक
- सबने महिलाओं के लिए विशेष योजनाएँ, स्कीमें और वादे किए
- रोजगार, सुरक्षा, और महंगाई जैसे मुद्दे महिलाओं को प्रभावित करते हैं
प्रवासी और अल्पसंख्यक समुदाय की लामबंदी
SIR और CAA जैसे मुद्दों ने कई समुदायों को मतदान के लिए प्रेरित किया।
विशेषकर मुस्लिम और ओबीसी इलाकों में उत्साह देखा गया।
नए दलों का असर—जन सुराज पार्टी की एंट्री क्यों महत्वपूर्ण है?
प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी इस चुनाव में बहस के केंद्र में रही।
बिहार की राजनीति दशकों से एक ही चेहरे—नीतीश बनाम लालू—के इर्द-गिर्द घूमती रही है।
ऐसे में एक नए विकल्प का उभरना:

- युवा वोटरों को आकर्षित करता है
- ग्रामीण इलाकों में नई चर्चा पैदा करता है
- पारंपरिक वोट बैंक को तोड़ता है
इतिहास बताता है कि जब किसी राज्य में तीसरी शक्ति उभरती है, तो मतदान प्रतिशत बढ़ जाता है:
- तमिलनाडु में 2006 में विजयकांत आए—11% वोटिंग बढ़ी
- दिल्ली में 2013 में AAP ने एंट्री ली—8% वोटिंग बढ़ी
बिहार में जन सुराज का प्रभाव भी इसी तरह का हो सकता है।
त्योहारों का असर—छठ और दीवाली ने भी बढ़ाया वोटिंग का प्रतिशत
बिहार में यह चुनाव दीवाली और छठ पूजा के बीच कराया गया था।
छठ पूजा राज्य का सबसे बड़ा त्योहार है, और लाखों प्रवासी इसी समय घर लौटते हैं।
राजनीतिक दलों ने भी अपील की थी कि प्रवासी मतदाता मतदान के बाद ही लौटें।
इसका वोटिंग प्रतिशत पर स्पष्ट प्रभाव पड़ा।
क्या उच्च मतदान किसी दल के समर्थन का संकेत है?
बहुत से लोग मानते हैं कि अधिक मतदान एंटी-इन्कम्बेंसी यानी सत्ता-विरोध का संकेत है,
लेकिन बिहार में यह समीकरण लागू नहीं होता।
2025 चुनाव में:
- नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव दोनों
अपने राजनीतिक करियर के अंतिम चुनाव लड़ रहे हैं - इस वजह से दोनों गठबंधनों ने पूरी ताकत झोंक दी
- हर पक्ष में गोलबंदी हुई
- इसने मतदान प्रतिशत को ऊपर धकेल दिया
असल नतीजे वोटिंग से नहीं, वोटों की दिशा से तय होंगे
और यह तब तक नहीं पता चलता जब तक परिणाम घोषित न हो जाएं।
क्या बढ़ा हुआ मतदान किसी बड़े बदलाव का संकेत है?
कुल मिलाकर देखा जाए तो—
- मतदाता सूची में 5.6% कटौती
- नए मतदाताओं की सीमित वृद्धि
- महिलाओं की बड़ी भागीदारी
- नए दलों का प्रभाव
- त्योहारों का समय
- पारंपरिक चुनावी गोलबंदी
इन सबको जोड़कर पता चलता है कि वोटिंग प्रतिशत का बढ़ना स्वाभाविक है, लेकिन
यह किसी साफ राजनीतिक संदेश की ओर इशारा नहीं करता।
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