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Shri Ganesh Mahotsav प्रयागराज में “पाठक मार्केट के राजा” के नाम से प्रसिद्ध श्री गणेश महोत्सव वर्ष 2011 से निरंतर भव्य रूप से मनाया जा रहा है। जानिए कैसे दक्षिण भारत से शुरू हुई श्री गणेश पूजा की परंपरा आज पूरे भारत, विशेषकर उत्तर भारत तक पहुँची और क्यों प्रयागराज का यह आयोजन भक्तिभाव, प्रेम और एकता का प्रतीक बन गया है।
श्री गणेश महोत्सव क्यों मनाया जाता है : आरंभ और पौराणिक कथा
भारत की परंपराओं में हर उत्सव केवल धार्मिक नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक धरोहर है।श्री गणेश महोत्सव भी ऐसा ही एक पर्व है, जो आज पूरे देश में श्रद्धा, संगीत और उत्साह के साथ मनाया जाता है।पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान महादेव ने अपने दोनों पुत्रों को दो दिशाओं की जिम्मेदारी सौंपी थी।भगवान कार्तिकेय जी को दक्षिण भारत का कार्यभार मिला।और भगवान श्री गणेश जी को उत्तर भारत का।बाद में दक्षिण भारत के भक्तों ने प्रेमपूर्वक बप्पा को अपने क्षेत्र में आमंत्रित करना प्रारंभ किया।ऐसा कहा जाता है कि श्री गणेश जी स्वयं अपने भाई कार्तिकेय जी से मिलने दक्षिण भारत गए और वहीं से उनके दक्षिण भारत में पूजन की परंपरा शुरू हुई।
गणेश पूजा की परंपरा का भारतभर में विस्तार
महाराष्ट्र में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने आज़ादी के आंदोलन के दौरान सार्वजनिक गणेशोत्सव की शुरुआत की थी।उन्होंने इसे समाज को जोड़ने और एकजुट करने का माध्यम बनाया।समय के साथ यह उत्सव संपूर्ण भारत में फैल गया।उत्तर भारत के वे लोग जो रोजगार या व्यापार के लिए महाराष्ट्र गए, वे वहाँ से इस भक्ति संस्कृति को अपने साथ लाए।आज उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, झारखंड सहित पूरे उत्तर भारत में गणेश पूजा बड़े उल्लास से मनाई जाती है।
प्रयागराज में “पाठक मार्केट के राजा” का वार्षिक आगमन
प्रयागराज के नैनी के हृदयस्थल पाठक मार्केट में वर्ष 2011 से श्री गणेश महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है,
जिसे श्रद्धापूर्वक “पाठक मार्केट के राजा” कहा जाता है।
यह आयोजन का प्रारंभ श्रीमती हिरावती पाठक और उनके पति स्वर्गीय श्री लालजी पाठक जी को मिले बप्पा की कृपा और प्रेरणा से हुआ । उन्होंने पहली बार इस आयोजन का आरंभ किया, और धीरे-धीरे पूरा मोहल्ला इस भक्ति में रंग गया।
आज यह पंडाल प्रयागराज शहर के सबसे पुराने और प्रमुख श्री गणपति पंडालों में गिना जाता है।
वहीं अब यह आयोजन भव्य, सामूहिक और सांस्कृतिक महोत्सव का रूप ले चुका है।
दक्षिण भारत की मान्यता और प्रयागराज की भक्ति

अक्सर लोग पूछते हैं — अगर श्री गणेश जी का आगमन दक्षिण भारत में माना गया है, तो प्रयागराज में इतना भव्य आयोजन क्यों होता है?”
इसका उत्तर है — भक्ति और भाव का संगम।
भाव बिना नहिं भक्ति जग, भक्ति बिना नहीं भाव।भक्ति भाव एक रूप हैं, दोऊ एक सुभाव॥
प्रयागराज के भक्तों का मानना है कि यहाँ मान्यताओं से अधिक भक्ति और प्रेम को सर्वोपरि माना गया है।यह आयोजन किसी व्यक्ति विशेष का नहीं, बल्कि स्वयं बप्पा की प्रेरणा से प्रारंभ हुआ उत्सव है।भक्त इसे श्री गणेश जी द्वारा दिया गया सौभाग्य और आशीर्वाद मानते हैं।
समर्पित आयोजक और भक्तों का सहयोग
इस महोत्सव के आयोजन में पूरे पाठक मार्केट परिवार और स्थानीय व्यापारियों का योगदान अमूल्य है।मुख्य रूप से विनोद पाठक, विरेन्द्र पाठक, विजेन्द्र पाठक, शिवम गुप्ता, अधिवक्ता कोमल पाठक, विनीता पाठक,महाजन (फ्रूट आइसक्रीम), सक्षम, राजू उपाध्याय, अमित, गोलू, आदर्श पासवान,सुल्तान, राधे डेयरी, रजत, गुड्डू, दाऊ, डीके,तथा समस्त पाठक मार्केट वासी। हर वर्ष जब “बप्पा का आगमन” होता है, तो पूरा इलाका संगीत और भक्तिमय वातावरण से जगमगा उठता है।यह दृश्य न केवल धार्मिक, बल्कि सामाजिक एकता और प्रेम का संदेश देता है।
निष्कर्ष : प्रेम और भक्ति ही असली पूजा है ऐसा कई महापुरुषों व संतजनो ने कहा है ।





श्री गणेश महोत्सव केवल पूजा का नहीं, बल्कि एकता, प्रेम और भक्ति का उत्सव है।
प्रयागराज का “पाठक मार्केट के राजा” हर वर्ष यह संदेश देता है कि —ईश्वर किसी क्षेत्र या भाषा का नहीं, बल्कि भावना और भक्ति का प्रतीक है। जिसमें प्रेम और निष्कपटता हो — वही सच्ची आराधना है।और इसी सच्चे भाव के साथ पूरे क्षेत्र में हर वर्ष गूंज उठती है पुकार —
गणपति बप्पा मोरया! मंगलमूर्ति मोरया!
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